
अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमम्,
न सा तत्रारम्भोऽस्त्यणुरपि च यत्राश्रमविधौ ।
ततस्तत्सिद्यर्थं परमकरुणो ग्रन्थमुभयम्,
भवानेवात्याक्षीन्न च विकृतवेशोपधिरत ॥62॥
अन्वयार्थ : प्राणियों की अहिंसा लोक में परम ब्रह्म जानी जाती है । जहाँ अणुमात्र भी आरम्भ विद्यमान है उस आश्रम-विधि में वह संभव नही है । इसलिए उस की सिद्धि के उद्देश्य से परम करुणा से युक्त आप ने ही दोनों परिग्रह को त्याग दिया था किन्तु विकृतवेशधारी तथा परिग्रह-धारी ने नहीं ।