अहिंसा भूतानां जगति विदितं ब्रह्म परमम्,
न सा तत्रारम्भोऽस्त्यणुरपि च यत्राश्रमविधौ ।
ततस्तत्सिद्यर्थं परमकरुणो ग्रन्थमुभयम्,
भवानेवात्याक्षीन्‍न च विकृतवेशोपधिरत ॥62॥
अन्वयार्थ : प्राणियों की अहिंसा लोक में परम ब्रह्म (के रूप में) जानी जाती (प्रसिद्ध) है । जहाँ अणुमात्र भी आरम्भ (हिंसा) विद्यमान है (ऐसी) उस आश्रम-विधि (व्यवस्था) में वह (अहिंसा) संभव नही है । इसलिए उस (अहिंसा / पूर्ण वीतरागता) की सिद्धि (उपलब्धि) के उद्देश्य से परम करुणा से युक्त आप (तीर्थंकर नमिनाथ जिनेन्द्र) ने ही दोनों (बाह्य व आभ्यन्तर) परिग्रह को त्याग दिया था किन्तु विकृतवेशधारी तथा परिग्रह-धारी (किसी शासनेतर देव) ने नहीं (त्याग किया है)