+ परमयोगी के लिए शरीर में ममकार नहीं -
बहिरबहिरसारे दुःखभारे शरीरे,
क्षयिणि बत रमन्ते मोहिनोऽस्मिन्‌ वराका ।
इति यदि तव बुद्धिर्निविकल्पस्वरूपे,
भव भवसि भवान्तस्थायिधामाधिपस्त्वम्‌ ॥63॥
अन्वयार्थ : बाहर और भीतर सारहीन (तुच्छ) दुखों के भार (से लदे हुए) विनाशशील इस शरीर में खेद की बात है कि बेचारे मोहग्रस्त प्राणी इस प्रकार की यदि तुम्हारी बुद्धि (विचारधारा) है तो निर्विकल्प निजस्वरूप में (स्थिर) हो जाओ (जिससे) तुम भव-भ्रमण का नाश हो जाने से स्थायित्व को प्राप्त (मुक्तिरूपी) धाम के स्वामी हो जाओगे ।