
अजंगमं जंगमनेययन्त्रम्,
यथा तथा जीवधृतं शरीरम् ।
वीभत्सु - पूति - क्षयि - तापकञ्च,
स्नेहो वृथाऽत्रेति हितं त्वमाख्य ॥64॥
अन्वयार्थ : जीव द्वारा धारण किया हुआ शरीर उसी प्रकार का है जैसे कि जड़ यन्त्र हो, जो जंगम द्वारा ले जाया जाता है और घृणात्मक, दुर्गन्धित, नश्वर और सन्ताप है। इस में स्नेह करना व्यर्थ है ऐसा हितकारी आप ने कहा है ।