अजंगमं जंगमनेययन्त्रम्,
यथा तथा जीवधृतं शरीरम् ।
वीभत्सु - पूति - क्षयि - तापकञ्च,
स्‍नेहो वृथाऽत्रेति हितं त्वमाख्य ॥64॥
अन्वयार्थ : जीव द्वारा धारण किया हुआ (यह) शरीर उसी प्रकार का है जैसे कि (कोई) जड़ यन्त्र हो, जो जंगम (चेतन व्यक्ति) द्वारा (प्रवतित होकर एक स्थान से दूसरे स्थान तक) ले जाया जाता है और (यह) घृणात्मक, दुर्गन्धित, नश्वर और सन्‍ताप (कष्टदायक) है। इस (ऐसे शरीर) में स्नेह करना व्यर्थ है ऐसा हितकारी (उपदेश) आप (सुपार्श्व जिनेन्द्र) ने कहा है ।