
इदमिदमतिरम्यं नेदमित्यादिभेदात्,
विदधति पदमेते राग-रोषोदयस्ते ।
तदलममलमेक निष्कलं निष्क्रिय सन्,
भज, भजसि समाधे सत्फलं येन नित्यम् ॥65॥
अन्वयार्थ : यह-यह अत्यन्त रमणीय है यह नही है इत्यादि भेदबुद्धि से ये राग-द्वेष आदिक तुम्हारे में प्रवेश करते हैं। इसलिए निवृत्त होओ क्रिया-रहित होते हुए निष्कलंक एक नि:शरीरी भजो जिससे कि तुम समाधि के अविनाशी श्रेष्ठ फल को भोग सकोगे / अनुभव करोगे ।