
तावत्क्रियाः प्रवर्तन्ते, यावद्-द्वैत्स्य गोचरम् ।
अद्वये निष्कले प्राप्ते, निष्क्रियस्य कुत क्रिया ॥66॥
अन्वयार्थ : जब तक द्वैत सम्बन्धी अनुभव होता है तबतक शुभाशुभ संकल्प-विकल्पादि आभ्यन्तर तथा शारीरिक वाचिक आदि बाह्य) क्रियाएँ प्रवर्तित होती रहती हैं । अखण्ड प्राप्त होने पर निष्क्रिय या निर्विकल्प के क्रियाऐं कैसे हो सकतीं है ?