
अहमहमिह मोहाद् भावना यावदन्त,
भवति भवति बन्धस्तावदेषोऽपि नित्यम् ।
क्षणिकमिदमशेषं विश्वमालोक्य तस्माद्,
व्रज शरणममन्द शान्तये त्वं समाधे ॥67॥
अन्वयार्थ : जब तक मोह के उदय के कारण मैं-मैं इस प्रकार की भावना इस मन में होती रहती है तब तक यह बन्ध भी नित्य / निरन्तर होता रहता है । इस सम्पूर्ण विश्व को क्षणभंगुर जानकर तुम आलस्य-रहित शान्ति के लिए समाधि की शरण में जाओ ।