साहंकारे मनसि न शमं याति जन्मप्रबन्धो,
नाहंकारश्चलति हृदयादात्मदृष्टौ च सत्याम्‌ ।
अन्य शास्ता जगति भवतो नास्ति नैरात्म्यवादी,
नान्यस्तस्मादुपशमविधेस्त्वन्मतादस्ति मार्ग: ॥68॥
अन्वयार्थ : चूंकि मन में अहंकार का भाव (रहने पर) जन्म (मरणरूप संसार) की परम्परा शान्त (समाप्त) नहीं होती है और आत्मदृष्टि (सम्यक्त्व) होने पर हृदय से (उपयोग में) अहंकार (अहंबुद्धि व ममबुद्धिभाव) गतिशील नहीं होता है और इसलोक में शून्यवादी कोई दूसरा उपदेशक नहीं है। इसलिए संसार-बन्ध के उपशम का तुम्हारे मत (सिद्धान्त) से भिन्‍न (कोई) मार्ग नहीं है ।