+ चिन्मयज्योतिरूप आत्मा -
रविरयमयमिन्दुर्द्योतयन्तौ पदार्थान्,
विलसति सति यस्मिन्‌ नासतीमौ तु भात ।
तदपि बत हतात्मा ज्ञानपुञ्जेऽपि तस्मिन,
व्रजति महति मोहं हेतुना केन कश्चित्‌ ॥69॥
अन्वयार्थ : यह (प्रत्यक्ष दृश्यमान) सूर्य और चन्द्र जिस (आत्मा) के प्रकाशमान होने पर ही पदार्थों को प्रकाशित कर (ने से समर्थ हो) पाते हैं। किन्तु (जिस आत्मा के प्रकाशमान) न होने पर दोनों (सूर्य-चन्द्र) प्रकाशक नहीं (होते है)। इसलिए अत्यन्त खेद की बात है (कि) उस महान्‌ ज्ञान (रूपी प्रकाश) के पुञ्ज (परमात्मतत्त्व के सम्बन्ध) में भी कोई हतभाग्य व्यक्ति क्या कारण है कि मोह (अज्ञानता) को प्राप्त हो जाता है।