
यो लोक ज्वलयत्यनल्पमहिसा सोऽप्येष तेजोनिधि:,
यस्मिन् सत्यवभाति नासति पुनर्देवोंऽशुमाली स्वयम्।
तस्मिन् बोधमयप्रकाश - विशदे मोहान्धकारापहे,
येऽन्तर्यामिनि पूरुषेऽप्रतिहते सशेरते ते हता ॥70॥
अन्वयार्थ : अत्यधिक महिमाशाली जो लोक को जलाता है वह भी यह स्वयं ज्योति-पुंज सूर्यदेव भी जिसके रहने पर प्रकाशमान होता है न रहने पर नही उस ज्ञानात्मक प्रकाश से विस्तीर्ण मोह / अज्ञानरूपी अन्धकार को दूर भगानेवाले अप्रतिहत / अबाधित सामर्थ्यवाले अन्तर में विद्यमान पुरुष के सम्बन्ध से जो सुप्त / प्रमाद-युक्त हैं वे हतभाग्य हैं विनाश को प्राप्त होते हैं ।