+ अनन्तसुख का कारण अतींद्रिय (स्वसंवेदन) ज्ञान (ही) उपादेय -
करणजनितबुद्धिर्नेक्षते मूर्ति-मुक्तम्‌,
श्रुतजनितमतिर्याऽस्पष्टमेयावभासा ।
उभयमतिनिरोध - स्पष्टमत्यक्षमक्षम्,
स्वमधिवस निवासं शाश्वतं लप्स्यसे त्वम् ॥71॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न या इन्द्रियाधीन ज्ञान अमूर्त (आत्म) तत्त्व को नहीं देख सकेगा । (और) जो श्रुतावरणकर्म के क्षयोपशम (अथवा जिनवाणी के अभ्यास से) जनित जो बुद्धि (है, वह) (ज्ञेयों का) पूर्णस्पष्ट व निर्मल अवभासन नहीं करा पाती है। (अत: इन) (पूर्वोक्त) दोनों प्रकार की बुद्धियों का निरोध करने पर स्पष्टता को प्राप्त इन्द्रियातीत (ऐसे) निजात्मतत्व में निवास करो (जिससे) तुम भी अविनाशी निवास (मोक्ष) को प्राप्त करोगे ।