
करणजनितबुद्धिर्नेक्षते मूर्ति-मुक्तम्,
श्रुतजनितमतिर्याऽस्पष्टमेयावभासा ।
उभयमतिनिरोध - स्पष्टमत्यक्षमक्षम्,
स्वमधिवस निवासं शाश्वतं लप्स्यसे त्वम् ॥71॥
अन्वयार्थ : इन्द्रियों के द्वारा उत्पन्न या इन्द्रियाधीन ज्ञान अमूर्त तत्त्व को नहीं देख सकेगा । जो श्रुतावरणकर्म के क्षयोपशम जनित जो बुद्धि पूर्णस्पष्ट व निर्मल अवभासन नहीं करा पाती है। दोनों प्रकार की बुद्धियों का निरोध करने पर स्पष्टता को प्राप्त इन्द्रियातीत निजात्मतत्व में निवास करो तुम भी अविनाशी निवास को प्राप्त करोगे ।