+ परमब्रह्मस्वरूप को प्राप्त न कर सकना ही संसार -
प्राणापानप्रयाण कफ-पवन-भवव्याधयस्तावदेते,
स्पन्दो दृष्टेश्च तावत्‌ तव चपलतया न स्थिराणीन्द्रियाणि ।
भोगा एते चर भोक्ता त्वमपि भवसि हे हेलया यावदन्त:,
साधो साधूपदेशात्‌ विशसि न परमब्रह्मणो निष्कलस्य ॥72॥
अन्वयार्थ : हे साधु ! समीचीन (धर्म) उपदेश (प्राप्त करने) से निष्कल परमब्रह्म के अन्दर क्रीडा मात्र से (सहजता के साथ) प्रविष्ट नहीं होते तब तक तुम्हारे उच्छवास-नि:श्वास का आवागमन (होता रहेगा) कफ व वायु (विकारों) से होने वाली ये व्याधियां (होती रहेगी) आँख का स्पन्दन (खुलना व झपकना) भी (होता रहेगा) चंचलता के कारण इन्द्रियाँ स्थिरता (को प्राप्त) नहीं (हो सकेंगी) ये (पचेन्द्रियों के) भोग भी (प्रस्तुत) रहेंगे और तुम (उन भोगों के) भोक्‍ता भी बने रहोगे ।