ब्रह्माण्डं यस्य मध्ये महदपि सदृश दृश्यते रेणुनेदम्,
तस्मिन्नाकाशरन्ध्रे निरवधिनि मनो दूरमायोज्य सम्यक्‌ ।
तेजोराशौ परेऽस्मिन्‌ परिहृत-सदसद्-वृत्तितो लब्धलक्ष्य,
हे दक्षाध्यक्षरूपे भव भवसि भवाम्बोधि-पारावलोकी ॥73॥
अन्वयार्थ : जिसके अन्दर (प्रतिबिम्बित) यह विशाल ब्रह्माण्ड भी धूलिकण् के समान दिखाई देता है उस असीम आकाशरन्ध्र में अच्छी तरह से अन्तस्तल तक मन को संयुक्त करके, हे दक्ष ! इस तेज पुंज (स्वसंवेदन द्वारा) प्रत्यक्षरूप परम (आत्मतत्त्व) में सभी शुभाशुभवृत्तियों का त्याग करने के कारण लक्ष्य को प्राप्त करने वाले बन जाओ (ताकि) संसार-समुद्र के पार स्थित (परमात्मतत्त्व) का साक्षात्कार करने वाले हो जाओ ।