संसारासारकर्मप्रचुरतर-मरुत्प्रेरणाद् भ्राम्यताऽत्र,
भ्रातर्ब्रह्माण्डखण्डे नव-नव-कुवपुर्गृहणता मुञ्चता च ।
कः क: कौतस्कुत: क्‍व क्वचिदपि विषयो यो न भुक्तो न मुक्त,
जातेदानीं विरक्तिस्तव यदि विष रे ! ब्रह्म-गम्भीरसिन्धुम्‌ ॥74॥
अन्वयार्थ : हे भाई ! इस संसार में नि:सार कर्मरूपी अधिक प्रवहमान वायु की प्रेरणा से भ्रमण करते हुए और ब्रह्माण्ड के (विविध) भागों में (नित) नये-नये कुत्सित शरीरों को धारणा करते और छोड़ते हुए (तुम्हारे द्वारा) कौन-कौन-सा किस-किस प्रकार से और कहाँ-कहाँ विषय (पदार्थ) है जो न भोगा गया हो और (भोगकर) न छोडा गया हो ? यदि तुम्हारे (मन में) अब विरक्ति (उत्पन्न) हुई हो (तो) हे भाई ! ब्रह्मरूपी गम्भीर समुद्र में प्रवेश कर जाओ ।