पारावारोऽतिपार सुगिरिरुरुरयं रे! वरं तीर्थमेतत्,
रेवा रंगत्तरंगा सुरसरिदपरा रेवतीशो हरिर्वा ।
इत्युद्भ्रान्तान्तरात्मा भ्रमति बहुतरं तावदात्मात्ममुक्त्यै,
यावद्-देहऽपि देही हित-विहित-हित-ब्रह्म शुद्ध न पश्येत् ॥75॥
अन्वयार्थ : जब तक शरीरधारी होते हुए भी (यह) आत्मा(कर्मों से) अपनी मुक्ति के लिए (प्राप्त) शरीर में शुद्ध(आत्म) हित के हेतु हितरूपता (निश्चयरत्नत्रयात्मकता) को प्राप्त ब्रह्म का साक्षात्कार नहीं करता तब तक 'यह अपार समुद्र (है)' '(यह) विशाल श्रेष्ठ पर्वत (है)', (और) बडी-बडी तरंगों वाली दूसरी देव नदी (गंगा) है', 'हे भाई ! यह (पूर्वोक्‍त) श्रेष्ठ तीर्थ है', 'यह बलराम अथवा विष्णु (की प्रतिमाएँ) हैं' इस प्रकार भ्रान्ति (अज्ञान) से युक्त अन्तरंगवाला आत्मा (होता हुआ यह जीव) (संसार में) अत्यधिक भटकता रहता है ।