+ संसार में कदापि सुख नहीं है -
विश्वे विश्वभरेशा शिरसि मम पादाम्भोजयुग्मं वदन्ते,
वश्या भावस्य लक्ष्मीर्वपुरपि निरघं विघ्नहेतु कुतो मे ।
इत्यादौ शर्म-हेतौ निपतति निखिले 'किं ततो' मुद्गरोऽयम्‌,
तस्मात्तद्‌ ध्याय किंचित्‌ स्थिरतरमनसा 'किं ततो' यत्र नास्ति ॥76॥
अन्वयार्थ : सम्पूर्ण राजा-महाराजा मेरे दोनों चरणकमलों को (अपने) मस्तक पर रखते है। लक्ष्मी (मेरे मनो-भावों की) वशीभूत है (मेरा) शरीर भी निरोग है, (तब फिर) मेरे लिए किस प्रकार विघ्न पैदा करने वाला (कोई होगा ?) इत्यादि समस्त सुख (कल्याण) के साधनों के होने पर (भी) 'तो या हुआ ?' (इस कथन रूप) यह मुद्गर गिरता है (अर्थात्‌ सभी सुख-साधनों पर प्रश्नचिह्न लगा देता है) इसलिए स्थिरचित्त से (एकाग्रमन होकर) उस अनिर्वचनीय (चेतनतत्त्व) का, ध्याय-ध्यान करो जिसमें 'तो क्‍या हुआ ?' (यह प्रश्नचिह्न) नही होता है ।