
दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां तत: किम्,
जाता श्रिय: सकलकामदुधास्तत: किम् ।
सन्तर्पिता प्रणयिनो विभवैस्तत: किम्,
कल्पस्थितं तनुभृतां तनुभिस्तत किम् ॥77॥
अन्वयार्थ : शत्रुओं के सिर पर पाँव रखा तो क्या हुआ ? समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली लक्ष्मी भी हुई तो क्या हुआ ? वैभव से प्रेमी को सन्तृप्त किया तो क्या हुआ ? इस देह से पृथ्वी पर कल्पान्त तक स्थित रहा गया तो क्या हुआ ?