+ भर्तृहरि के द्वारा प्रतिपादित संसार की असारता -
दत्तं पदं शिरसि विद्विषतां तत: किम्,
जाता श्रिय: सकलकामदुधास्तत: किम् ।
सन्तर्पिता प्रणयिनो विभवैस्तत: किम्,
कल्पस्थितं तनुभृतां तनुभिस्तत किम् ॥77॥
अन्वयार्थ : शत्रुओं के सिर पर पाँव रखा तो क्‍या हुआ ? समस्त कामनाओं की पूर्ति करने वाली लक्ष्मी (ऐश्वर्य, विभूतियां) भी हुई तो क्या हुआ ? वैभव (सम्पत्ति) से प्रेमी (इष्टजनों) को सन्तृप्त किया तो (भी) क्या हुआ ? इस देह से पृथ्वी पर कल्पान्त तक स्थित (जीवित) रहा गया तो (भी) क्‍या हुआ ? (अविनाशी निराबाध सुख तो नही मिला, तथा भौतिक सुख-साधनों का तो एक-न-एक दिन अभाव होगा और मृत्यु का मुख देखना ही पडेगा ।)