
तस्मादनन्तमजरं परम-प्रकाशम्,
तच्चित्त चिन्तय किमेभिरसद् -विकल्पै ।
यस्यानुषंगिण इमे भुवनाधिपत्य-
भोगादय कृपणजन्तुमता भवन्ति ॥78॥
अन्वयार्थ : इसलिए हे मन ! इन अप्रशस्त विकलपों से क्या लाभ ? उस अनन्त-अजर-परमज्योति स्वरूप का ध्यान करो। ये लोकाधिपति आदि के काम-भोग आदि जिस के आनुषंगिक हैं अज्ञानी जनों के लिए ही सम्मत होते हैं ।