
उपशमफलाद् विद्याबीजात्फलं वरमिच्छताम्,
भवति विपुलो यद्यायास्तदत्र किमद्भुतम् ।
न नियतफला सर्वे भावा फलान्तरमीशते,
जनयति खलु व्रीहेर्बीजं न जातु यवाङकुरम् ॥79॥
अन्वयार्थ : उपशम भावरूप फलवाले ज्ञानरूपी बीज से उत्कृष्ट फल को चाहने वालों का यदि अत्यधिक श्रम होता है तो इसमें आश्चर्य की क्या बात है ? निश्चित फल वाले समस्त पदार्थ भिन्न फल को समर्थ नहीं होते हैं । धान का बीज कभी भी जौ के अंकुर को उत्पन्न नहीं करता है ।