+ केवलज्ञान -
लोयालोयं सव्वं जाणइ पेच्छइ करणकमरहियं ।
मुत्तामुत्ते दव्वे अणंतपज्जायगुणकलिए ॥69॥
मूरतिवंत अमूरतिवंत, गुण अनंत परजाय अनंत ।
लोक अलोक त्रिकाल विथार, देखै जानै एकहि बार ॥69॥
अन्वयार्थ : [करणकमरहियं] इंद्रियों के क्रम से रहित एक साथ [सव्वं] सर्व [लोयालोयं] लोक और अलोक को, तथा [अणंतपज्जायगुणकलिए] अनन्त पर्याय और अनन्त गुणों से संयुक्त सभी [मुत्तामुत्ते दव्वे] मूर्त और अमूर्त द्रव्यों को [जाणइ] जानता है और [पेच्छइ] देखता है।