+ सिद्ध जीव का अवस्थान -
धम्माभावे परदो गमणं णत्थि त्ति तस्स सिद्धस्स ।
अच्छइ अणंतकालं लोयग्गणिवासिओ होउ ॥70॥
(सोरठा)
लोकसिखर तनुवात, कालअनंत तहां बसे ।
धरमद्रव्य विख्यात, जहां तहां लौं थिर रहै ॥70॥
अन्वयार्थ : [तस्स सिद्धस्स] उस सिद्ध परमात्मा का [धम्माभावे] धर्मद्रव्य का अभाव होने से [परदो] लोक से परे अलोक में [गमणं णत्थि त्ति] गमन नहीं है, इस कारण [लोयग्गणिवासिओ होउ] लोकाग्र निवासी होकर वहाँ [अणंतकाल] अनंत काल तक [अच्छइ] रहते हैं।