
संते वि धम्मदव्वे अहो ण गच्छेइ तह य तिरियं वा ।
उड्ढगमणसहाओ मुक्को जीवो हवे जम्हा ॥71॥
ऊरधगमन सुभाव, तातैं बंक चलै नहीं ।
लोकअंत ठहराव, आगैं धर्मदरव नहीं ॥71॥
अन्वयार्थ : [मुक्को जीवो] कर्मों से मुक्त हुआ जीव [धम्मदव्वे संते वि] धर्म-द्रव्य के होने पर भी [अहो ण गच्छेइ] नीचे नहीं जाता है, [तह य तिरियं वा] उसी प्रकार तिरछा भी नहीं जाता है। [जम्हा] क्योंकि मुक्त जीव [उड्ढगमणसहाओ] ऊर्ध्वगमन स्वभाव वाला [हवे] है ।