
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
निश्चयप्रत्याख्यानयोग्यजीवस्वरूपाख्यानमेतत् । सकलकषायकलंकपंकविमुक्तस्य निखिलेन्द्रियव्यापारविजयोपार्जितपरमदान्तरूपस्यअखिलपरीषहमहाभटविजयोपार्जितनिजशूरगुणस्य निश्चयपरमतपश्चरणनिरतशुद्धभावस्य संसार-दुःखभीतस्य व्यवहारेण चतुराहारविवर्जनप्रत्याख्यानम् । किं च पुनः व्यवहारप्रत्याख्यानं कुद्रष्टेरपि पुरुषस्य चारित्रमोहोदयहेतुभूतद्रव्यभावकर्मक्षयोपशमेन क्वचित् कदाचित् संभवति ।अत एव निश्चयप्रत्याख्यानं हितम् अत्यासन्नभव्यजीवानाम्; यतः स्वर्णनाम-धेयधरस्य पाषाणस्योपादेयत्वं न तथांधपाषाणस्येति । ततः संसारशरीरभोगनिर्वेगता निश्चय-प्रत्याख्यानस्य कारणं, पुनर्भाविकाले संभाविनां निखिलमोहरागद्वेषादिविविधविभावानां परिहारः परमार्थप्रत्याख्यानम्, अथवानागतकालोद्भवविविधान्तर्जल्पपरित्यागः शुद्ध-निश्चयप्रत्याख्यानम् इति । (कलश--हरिणी) जयति सततं प्रत्याख्यानं जिनेन्द्रमतोद्भवं परमयमिनामेतन्निर्वाणसौख्यकरं परम् । सहजसमतादेवीसत्कर्णभूषणमुच्चकैः मुनिप शृणु ते दीक्षाकान्तातियौवनकारणम् ॥१४२॥ जो जीव निश्चय-प्रत्याख्यान के योग्य हो ऐसे जीव के स्वरूप का यह कथन है । जो समस्त कषाय-कलंकरूप कीचड़ से विमुक्त है, सर्व इन्द्रियों के व्यापार पर विजय प्राप्त कर लेने से जिसने परम दान्तरूपता प्राप्त की है, सकल परिषहरूपी महा-सुभटों को जीत लेने से जिसने निज शूरगुण प्राप्त किया है, निश्चय - परम-तपश्चरण में निरत(लीन) ऐसा शुद्धभाव जिसे वर्तता है तथा जो संसार दुःख से भयभीत है, उसे (यथोचित शुद्धता सहित) व्यवहार से चार आहार के त्यागरूप प्रत्याख्यान है । परन्तु (शुद्धता रहित) व्यवहार-प्रत्याख्यान तो कुदृष्टि (मिथ्यात्वी) पुरुष को भी चारित्रमोह के उदय के हेतुभूत द्रव्यकर्म-भावकर्म के क्षयोपशम द्वारा क्वचित् कदाचित् संभवित है । इसीलिये निश्चय-प्रत्याख्यान अति-आसन्नभव्य जीवों को हितरूप है; क्योंकि जिसप्रकार सुवर्णपाषाण नामक पाषाण उपादेय है उसीप्रकार अन्धपाषाण नहीं है । इसलिये (यथोचित् शुद्धता सहित) संसार तथा शरीर सम्बन्धी भोग की निर्वेगता निश्चय-प्रत्याख्यान का कारण है और भविष्य काल में होनेवाले समस्त मोह-राग-द्वेषादि विविध विभावों का परिहार वह परमार्थ प्रत्याख्यान है अथवा अनागत काल में उत्पन्न होनेवाले विविध अन्तर्जल्पों (विकल्पों) का परित्याग, वह शुद्ध निश्चय-प्रत्याख्यान है । (कलश--हरिगीत)
हे मुनिवर ! सुन; जिनेन्द्र के मत में उत्पन्न होनेवाला प्रत्याख्यान सतत् जयवन्त है । वह प्रत्याख्यान परम संयमियों को उत्कृष्टरूप से निर्वाणसुख का करनेवाला है, सहज समतादेवी के सुन्दर कर्ण का महा आभूषण है और तेरी दीक्षारूपी प्रिय स्त्री के अतिशय यौवन का कारण है ।
अरे समतासुन्दरी के कर्ण का भूषण कहा । और दीक्षा सुन्दरी की जवानी का हेतु जो ॥ अरे प्रत्याख्यान वह जिनदेव ने जैसा कहा । निर्वाण सुख दातार वह तो सदा ही जयवंत है ॥१४२॥ |