
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
अत्र ज्ञानस्वरूपो जीव इति वितर्केणोक्त : । इह हि ज्ञानं तावज्जीवस्वरूपं भवति, ततो हेतोरखंडाद्वैतस्वभावनिरतंनिरतिशयपरमभावनासनाथं मुक्ति सुंदरीनाथं बहिर्व्यावृत्तकौतूहलं निजपरमात्मानं जानाति कश्चिदात्मा भव्यजीव इति अयं खलु स्वभाववादः । अस्य विपरीतो वितर्कः स खलु विभाववादःप्राथमिकशिष्याभिप्रायः । कथमिति चेत्, पूर्वोक्त स्वरूपमात्मानं खलु न जानात्यात्मा, स्वरूपाव-स्थितः संतिष्ठति । यथोष्णस्वरूपस्याग्नेः स्वरूपमग्निः किं जानाति, तथैव ज्ञानज्ञेयविकल्पा-भावात् सोऽयमात्मात्मनि तिष्ठति । हंहो प्राथमिकशिष्य अग्निवदयमात्मा किमचेतनः । किंबहुना । तमात्मानं ज्ञानं न जानाति चेद् देवदत्तरहितपरशुवत् इदं हि नार्थक्रियाकारि, अत एवआत्मनः सकाशाद् व्यतिरिक्तं भवति । तन्न खलु सम्मतं स्वभाववादिनामिति । तथा चोक्तं श्रीगुणभद्रस्वामिभिः - (कलश--अनुष्टुभ्) ज्ञानस्वभावः स्यादात्मा स्वभावावाप्तिरच्युतिः । तस्मादच्युतिमाकांक्षन् भावयेज्ज्ञानभावनाम् ॥ तथा हि - (कलश--मंदाक्रांता) ज्ञानं तावद्भवति सुतरां शुद्धजीवस्वरूपं स्वात्मात्मानं नियतमधुना तेन जानाति चैकम् । तच्च ज्ञानं स्फुटितसहजावस्थयात्मानमारात्नो जानाति स्फुटमविचलाद्भिन्नमात्मस्वरूपात् ॥२८६॥ तथा चोक्तम् - णाणं अव्विदिरित्तं जीवादो तेण अप्पगं मुणइ । जदि अप्पगं ण जाणइ भिण्णं तं होदि जीवादो ॥ यहाँ (इस गाथा में) 'जीव ज्ञान-स्वरूप है' ऐसा वितर्क से (दलील से) कहा है । प्रथम तो, ज्ञान वास्तव में जीव का स्वरूप है; उस हेतु से, जो अखण्ड अद्वैत स्वभाव में लीन है, जो निरतिशय परम भावना सहित है, जो मुक्ति-सुन्दरी का नाथ है और बाह्य में जिसने कौतूहल व्यावृत्त किया है (बाह्य पदार्थों सम्बन्धी कुतूहल का जिसने अभाव किया है) ऐसे निज परमात्मा को कोई आत्मा, भव्य जीव, जानता है । -- ऐसा यह वास्तव में स्वभाववाद है । इससे विपरीत वितर्क (विचार ) वह वास्तव में विभाववाद है, प्राथमिक शिष्य का अभिप्राय है । वह (विपरीत वितर्क -- प्राथमिक शिष्य का अभिप्राय) किसप्रकार है ? (वह इसप्रकार है :-) 'पूर्वोक्त स्वरूप (ज्ञानस्वरूप) आत्मा को आत्मा वास्तव में जानता नहीं है, स्वरूप में अवस्थित रहता है (आत्मा में मात्र स्थित रहता है ) । जिस प्रकार उष्णता स्वरूप अग्नि के स्वरूप को (अग्नि को) क्या अग्नि जानती है ? उसीप्रकार ज्ञानज्ञेय सम्बन्धी विकल्प के अभाव से यह आत्मा आत्मा में (मात्र) स्थित रहता है (आत्मा को जानता नहीं है ) ।' (उपरोक्त वितर्क का उत्तर :-) 'हे प्राथमिक शिष्य ! अग्नि की भाँति क्या यह आत्मा अचेतन है (कि जिससे वह अपने को न जाने) ? अधिक क्या कहा जाये ? (संक्षेप में) यदि उस आत्मा को ज्ञान न जाने तो वह ज्ञान, देवदत्त रहित कुल्हाड़ी की भाँति, अर्थक्रियाकारी सिद्ध नहीं होगा, और इसलिये वह आत्मा से भिन्न सिद्ध होगा ! वह तो (ज्ञान और आत्मा की सर्वथा भिन्नता तो) वास्तव में स्वभाववादियों को संमत नहीं है' । (इसलिये निर्णय कर कि ज्ञान आत्मा को जानता है ।) इसीप्रकार (आचार्यवर ) श्री गुणभद्रस्वामी ने (आत्मानुशासन में १७४वें श्लोक द्वारा) कहा है कि :- (कलश--दोहा)
आत्मा ज्ञानस्वभाव है; स्वभाव की प्राप्ति वह अच्युति (अविनाशी दशा) है; इसलिये अच्युति को (अविनाशीपने को, शाश्वत दशा को) चाहनेवाले जीव को ज्ञान की भावना भाना चाहिये ।ज्ञानस्वभावी आतमा स्वभावप्राप्ति है इष्ट । अत: मुमुक्षु जीव को ज्ञानभावना इष्ट ॥६८॥ और - (कलश-रोला)
ज्ञान तो बराबर शुद्धजीव का स्वरूप है; इसलिये (हमारा) निज-आत्मा अभी (साधक दशा में) एक (अपने) आत्मा को नियम से (निश्चय से) जानता है । और, यदि वह ज्ञान प्रगट हुई सहज दशा द्वारा सीधा (प्रत्यक्षरूप से) आत्मा को न जाने तो वह ज्ञान अविचल आत्म-स्वरूप से अवश्य भिन्न सिद्ध होगा ।शुद्धजीव तो एकमात्र है ज्ञानस्वरूपी । अत: आतमा निश्चित जाने निज आतम को ॥ यदि साधक न जाने स्वातम को प्रत्यक्ष तो । ज्ञान सिद्ध हो भिन्न निजातम से हे भगवन् ॥२८६॥ और इसीप्रकार (अन्यत्र गाथा द्वारा) कहा है कि :- (कलश--दोहा)
ज्ञान जीव से अभिन्न है इसलिये वह आत्मा को जानता है; यदि ज्ञान आत्मा को न जाने तो वह जीव से भिन्न सिद्ध होगा ।
ज्ञान अभिन है आत्म से अत: जाने निज आत्म । भिन्न सिद्ध हो वह यदि न जाने निज आत्म ॥६९॥ |