
पद्मप्रभमलधारिदेव : संस्कृत
परमनिर्वाणयोग्यपरमतत्त्वस्वरूपाख्यानमेतत् । अखंडैकप्रदेशज्ञानस्वरूपत्वात् स्पर्शनरसनघ्राणचक्षुःश्रोत्राभिधानपंचेन्द्रियव्यापाराःदेवमानवतिर्यगचेतनोपसर्गाश्च न भवन्ति, क्षायिकज्ञानयथाख्यातचारित्रमयत्वान्न दर्शन-चारित्रभेदविभिन्नमोहनीयद्वितयमपि, बाह्यप्रपंचविमुखत्वान्न विस्मयः, नित्योन्मीलित-शुद्धज्ञानस्वरूपत्वान्न निद्रा, असातावेदनीयकर्मनिर्मूलनान्न क्षुधा तृषा च । तत्र परम-ब्रह्मणि नित्यं ब्रह्म भवतीति । तथा चोक्तममृताशीतौ — (मालिनी) ज्वरजननजराणां वेदना यत्र नास्ति परिभवति न मृत्युर्नागतिर्नो गतिर्वा । तदतिविशदचित्तैर्लभ्यतेऽङ्गेऽपि तत्त्वं गुणगुरुगुरुपादाम्भोजसेवाप्रसादात् ॥ तथा हि - (कलश--मंदाक्रांता) यस्मिन् ब्रह्मण्यनुपमगुणालंकृते निर्विकल्पे- ऽक्षानामुच्चैर्विविधविषमं वर्तनं नैव किंचित् । नैवान्ये वा भविगुणगणाः संसृतेर्मूलभूताः तस्मिन्नित्यं निजसुखमयं भाति निर्वाणमेकम् ॥३००॥ यह, परम निर्वाण के योग्य परमतत्त्व के स्वरूप का कथन है । (परमतत्त्व ) *अखण्ड - एकप्रदेशी - ज्ञानस्वरूप होने के कारण (उसे) स्पर्शन, रसन, घ्राण, चक्षु और श्रोत्र नाम की पाँच इन्द्रियों के व्यापार नहीं हैं तथा देव, मानव, तिर्यञ्च और अचेतनकृत उपसर्ग नहीं हैं; क्षायिक-ज्ञानमय और यथाख्यात-चारित्रमय होने के कारण (उसे) दर्शन-मोहनीय और चारित्र-मोहनीय ऐसे भेदवाला दो प्रकार का मोहनीय नहीं है; बाह्य-प्रपंच से विमुख होने के कारण (उसे) विस्मय नहीं है; नित्य - प्रकटित शुद्ध-ज्ञानस्वरूप होने के कारण (उसे) निद्रा नहीं है; असातावेदनीय कर्म को निर्मूल कर देने के कारण (उसे) क्षुधा और तृषा नहीं है । उस परम ब्रह्म में (परमात्म तत्त्व में) सदा ब्रह्म (निर्वाण) है । इसीप्रकार (श्रीयोगीन्द्रदेवकृत) अमृताशीति में (५८वें श्लोक द्वारा) कहा है कि :- (कलश--रोला)
जहाँ (जिस तत्त्व में) ज्वर, जन्म और जरा की वेदना नहीं है, मृत्यु नहीं है, गति या आगति नहीं है, उस तत्त्व का अति निर्मल चित्तवाले पुरुष, शरीर में स्थित होने पर भी, गुण में बड़े ऐसे गुरु के चरण-कमल की सेवा के प्रसाद से अनुभव करते हैं ।जनम जरा ज्वर मृत्यु भी है पास न जिसके । गती-अगति भी नाहिं है उस परमतत्त्व को ॥ गुरुचरणों की सेवा से निर्मल चित्तवाले । तन में रहकर भी अपने में पा लेते हैं ॥७३॥ और (कलश--रोला)
अनुपम गुणों से अलंकृत और निर्विकल्प ऐसे जिस ब्रह्म में (आत्मतत्त्व में) इन्द्रियों का अति विविध और विषम वर्तन किंचित् भी नहीं ही है, तथा संसार के मूलभूत अन्य (मोह - विस्मयादि) २संसारी गुणसमूह नहीं ही हैं, उस ब्रह्म में सदा निजसुखमय एक निर्वाण प्रकाशमान है ।अनुपम गुण से शोभित निर्विकल्प आतम में । अक्षविषमवर्तन तो किंचित्मात्र नहीं है ॥ भवकारक गुणमोह आदि भी जिसमें न हों । उसमें निजगुणरूप एक निर्वाण सदा है ॥३००॥ १खण्ड-रहित अभिन्न-प्रदेशी ज्ञान परम-तत्त्व का स्वरूप है इसलिये परम-तत्त्व को इन्द्रियाँ और उपसर्ग नहीं हैं । २मोह, विस्मय आदि दोष संसारियों के गुण हैं -- कि जो संसार के कारणभूत हैं । |