+ देव होकर मानसिक दुःख पाये -
देवाण गुण विहूई इड्ढी माहप्प बहुविहं दट्ठुं
होऊण हीणदेवो पत्तो बहु माणसं दुक्खं ॥15॥
निज हीनता अर विभूति गुण-ऋद्धि महिमा अन्य की ।
लख मानसिक संताप हो है यह अवस्था देव की ॥१५॥
अन्वयार्थ : स्वर्ग में हीन देव होकर बड़े ऋद्धिधारी देव के अणिमादि गुण की विभूति देखे तथा देवांगना आदि का बहुत परिवार देखे और आज्ञा, ऐश्वर्य आदिका माहात्म्य देखे तब मन में इसप्रकार विचारे कि मैं पुण्य-रहित हूँ, ये बड़े पुण्यवान् हैं, इनके ऐसी विभूति माहात्म्य ऋद्धि है, इसप्रकार विचार करने से मानसिक दुःख होता है ।

  जचंदछाबडा