+ अशुभ भावना से नीच देव होकर दुःख पाते हैं -
चउविहविकहासत्तो मयमत्तो असुहभावपयडत्थो
होऊण कुदेवत्तं पत्तो सि अणेयवाराओ ॥16॥
चतुर्विध विकथा कथा आसक्त अर मदमत्त हो ।
यह आतमा बहुबार हीन कुदेवपन को प्राप्त हो ॥१६॥
अन्वयार्थ : हे जीव ! तू चार प्रकार की विकथा में आसक्त होकर, मद से मत्त और जिसके अशुभ भावना का ही प्रकट प्रयोजन है इसप्रकार अनेकबार कुदेवपने को प्राप्त हुआ ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

स्त्रीकथा, भोजनकथा, देशकथा और राजकथा इन चार विकथाओंमें आसक्त होकर वहाँ परिणाम को लगाया तथा जाति आदि साठ मदों से उन्मत्त हुआ, ऐसी अशुभ भावना ही का प्रयोजन धारण कर अनेकबार नीच देवपने को प्राप्त हुआ, वहाँ मानसिक दुःख पाया ।

यहाँ यह विशेष जानने योग्य हैं कि विकथादिक से तो नीच देव भी नहीं होता है, परन्तु यहाँ मुनि को उपदेश है, वह मुनिपद धारणकर कुछ तपश्चरणादिक भी करे और वेषमें विकथादिक में रक्त हो तब नीच देव होता है, इसप्रकार जानना चाहिये ॥१६॥