
दुज्जणवयणचडक्कं णिट्ठरकडुयं सहंति सप्पुरिसा
कम्ममलणासणट्ठं भावेण य णिम्ममा सवणा ॥107॥
दुर्जनवचनपेटां निष्ठुरकटुकं सहन्ते सत्पुरुषाः
कर्ममलनाशनार्थं भावेन च निर्ममाः श्रमणाः ॥१०७॥
निष्ठुर कटुक दुर्जन वचन सत्पुरुष सहें स्वभाव से ।
सब कर्मनाशन हेतु तुम भी सहो निर्मम भाव से ॥१०७॥
अन्वयार्थ : सत्पुरुष मुनि हैं वे दुर्जन के वचनरूप चपेट जो निष्ठुर दयारहित और कट्ठक ऐसी चपेट है उसको सहते हैं । वे किसलिये सहते हैं ? कर्मों का नाश होने के लिये सहते हैं । पहिले अशुभ-कर्म बाँधे थे उसके निमित्त से दुर्जन ने कटुक वचन कहे, आपने सुने, उसको उपशम परिणाम से आप सहे तब अशुभ-कर्म उदय होय खिर गये । ऐसे कटुक-वचन सहने से कर्म का नाश होता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
वे मुनि सत्पुरुष कैसे हैं ? अपने भाव से वचनादिक से निर्ममत्व हैं, वचन से तथा मानकषाय से और देहादिक से ममत्व नहीं है । ममत्व हो तो दुर्वचन सहे न जावें, यह न जाने कि इसने मुझे दुर्वचन कहे, इसलिये ममत्व के अभाव से दुर्वचन कहते हैं । अतः मुनि होकर किसी पर क्रोध नहीं करना यह उपदेश है । लौकिक में भी जो बड़े पुरुष हैं वे दुर्वचन सुनकर क्रोध नहीं करते हैं, तब मुनि को सहना उचित ही है । जो क्रोध करते हैं वे कहने के तपस्वी हैं, सच्चे तपस्वी नहीं है ॥१०७॥
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