
गुणगणमणिमालाए जिणमयगयणे णिसायरमुणिंदो
तारावलिपरियरिओ पुण्णिमइंदुव्व पवणपहे ॥160॥
गुणगणमणिमालया जिनमतगगने निशाकरमुनींद्रः
तारावलीपरिकरितः पूर्णिमेन्दुरिव पवनपथे ॥१६०॥
सद्गुणों की मणिमाल जिनमत गगन में मुनि निशाकर ।
तारावली परिवेष्ठित हैं शोभते पूर्णेन्दु सम ॥१६०॥
अन्वयार्थ : जैसे पवनपथ में ताराओं की पंक्ति के परिवार से वेष्टित पूर्णिमा का चन्द्रमा शोभा पाता है, वैसे ही जिनमतरूप आकाश में गुणों के समूहरूपी मणियों की माला से मुनीन्द्ररूप चंद्रमा शोभा पाता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
अट्ठाईस मूल-गुण, दशलक्षण धर्म, तीन गुप्ति और चौरासी लाख उत्तर-गुणों की माला सहित मुनि जिनमत में चन्द्रमा के समान शोभा पाता है, ऐसे मुनि अन्यमत में नहीं हैं ॥१६०॥
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