
जचंदछाबडा :
जो मुनि संयमी पाँच महाव्रत, पाँच समिति, तीन गुप्ति यह तेरह प्रकार का चारित्र वही प्रवृत्तिरूप व्यवहार-चारित्र संयम है, उसको अंगीकार करके और पूर्वोक्त प्रकार निश्चयचारित्र से युक्त होकर अपनी शक्ति के अनुसार उपवास, कायक्लेशादि बाह्य तप करता है वह मुनि अंतरंग तप, ध्यान के द्वारा शुद्ध-आत्मा का एकाग्र चित्त करके ध्यान करता हुआ निर्वाण को प्राप्त करता है ॥४३॥ |