
तिहि तिण्णि धरवि णिच्चं तियरहिओ तह तिएण परियरिओ
दोदोसविप्पमुक्को परमप्पा झायए जोई ॥44॥
त्रिभिः त्रीन् धृत्वा नित्यं त्रिकरहितः तथा त्रिकेण परिकरितः
द्विदोषविप्रमुक्तः परमात्मानं ध्यायते योगी ॥४४॥
मदमायाक्रोधरहितः लोभेन विवर्जितश् यः जीवः
निर्मलस्वभावयुक्तः यः प्राप्नोति उत्तमं सौख्यम् ॥४५॥
रुष-राग का परिहार कर त्रययोग से त्रयकाल में ।
त्रयशल्य विरहित रतनत्रय धर योगि ध्यावे आत्मा ॥४४॥
जो जीव माया-मान-लालच-क्रोध को तज शुद्ध हो ।
निर्मल-स्वभाव धरे वही नर परमसुख को प्राप्त हो ॥४५॥
अन्वयार्थ : [तिहि] मन-वचन-काय से, [तिण्णि] वर्षा-शीत-उष्ण तीन कालयोगों को [णिच्चं धरवि] नित्य धारणकर, [तियरहिओ] माया, मिथ्या, निदान तीन शल्यों से रहित होकर [तह] तथा [तिएण परियरिओ] दर्शन, ज्ञान, चारित्र से मंडित होकर और [दोदोसविप्पमुक्को] दो दोष से रहित होता हुआ [जोई] योगी [परमप्पा झायए] शुद्ध आत्मा का ध्यान करता है ।
[मय] मद, [माय] माया, [कोहरहिओ] क्रोध से रहित, [लोहेण] लोभ से [विवज्जिओ] विशेषरूप से रहित [य जो जीवो] ऐसा जो जीव [सो] वह अपने [णिम्मलसहावजुत्तो] निर्मल विशुद्ध स्वभाव युक्त हो [पावइ उत्तमं सोक्खं] उत्तम सुख को प्राप्त करता है ।
जचंदछाबडा
जचंदछाबडा :
मन वचन काय से तीन कालयोग धारणकर परमात्मा का ध्यान करे, इस प्रकार कष्ट में दृढ़ रहे तब ज्ञात होता है कि इसके ध्यान की सिद्धि है, कष्ट आने पर चलायमान हो जाये तब ध्यान की सिद्धि कैसी ? कोई प्रकार की चित्त में शल्य रहने से चित्त एकाग्र नहीं होता है तब ध्यान कैसे हो ? इसलिये शल्य रहित कहा; श्रद्धान, ज्ञान, आचरण यथार्थ न हो तब ध्यान कैसा ? इसलिये दर्शन, ज्ञान, चारित्र, मंडित कहा और राग-द्वेष, इष्ट-अनिष्ट बुद्धि रहे तब ध्यान कैसे हो ? इसलिए परमात्मा का ध्यान करे, वह ऐसा होकर करे, यह तात्पर्य है ॥४४॥
लोक में भी ऐसा है कि जो मद अर्थात् अति मानी तथा माया कपट और क्रोध इनसे रहित हो और लोभ से विशेष रहित हो वह सुख पाता है; तीव्र कषायी अति आकुलता युक्त होकर निरन्तर दुःखी रहता है । अतः यही रीति मोक्षमार्ग में भी जानो -- जो क्रोध, मान, माया, लोभ चार कषायों से रहित होता है तब निर्मल भाव होते हैं और तब ही यथाख्यातचारित्र पाकर उत्तम सुख को प्राप्त करता है ॥४५॥
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