+ सब से उत्तम पदार्थ -- शुद्ध-आत्मा इस देह में ही रह रहा है, उसको जानो -
णविएहिं जं णविज्जइ झाइज्जइ झाइएहिं अणवरयं
थुव्वंतेहिं थुणिज्जइ देहत्थं किं पि तं मुणह ॥103॥
नतैः यत् नम्यते ध्यायते ध्यातैः अनवरतम्
स्तूयमानैः स्तूयते देहस्थं किमपि तत् जानीत ॥१०३॥
जिनको नमे थुति करे जिनकी ध्यान जिनका जग करे ।
वे नमें ध्यावें थुति करें तू उसे ही पहिचान ले ॥१०३॥
अन्वयार्थ : [णविएहिं जं णविज्जइ] नमन करने योग्य जिसे नमन करते हैं [झाइज्जइ झाइएहिं अणवरयं] ध्यान करने योग्य जिसका अनवरत ध्यान करते हैं [थुव्वंतेहिं थुणिज्जइ] स्तुति करने योग्य जिसकी स्तुति करते हैं [देहत्थं] देह में स्थित [किं पि तं मुणह] ऐसा क्या है उसे जानो ।

  जचंदछाबडा 

जचंदछाबडा :

शुद्ध परमात्मा है वह यद्यपि कर्म से आच्छादित है, तो भी भेद-ज्ञानी इस देह ही में स्थित का ही ध्यान करके तीर्थंकरादि भी मोक्ष प्राप्त करते है, इसलिये ऐसा कहा है कि -- लोक में नमने योग्य तो इंद्रादिक हैं और ध्यान करने योग्य तीर्थंकरादिक हैं तथा स्तुति करने योग्य तीर्थंकरादिक हैं वे भी जिसको नमस्कार करते हैं, जिसका ध्यान करते हैं स्तुति करते हैं ऐसा कुछ वचन के अगोचर भेदज्ञानियों के अनुभवगोचर परमात्मा वस्तु है, उसका स्वरूप जानो, उसको नमस्कार करो, उसका ध्यान करो, बाहर किसलिये ढूँढ़ते हो, इस प्रकार उपदेश हैं ॥१०३॥