
एवं आपुच्छित्ता सगवरगुरुणा विसज्जिओ संतो
अप्पचउत्थो तदिओ बिदिओ वासो तदो णीदी ॥147॥
अन्वयार्थ : गुरु से पूछकर अपने पूज्य गुरु से आज्ञा लेकर वह मुनि अपने सहित चार या तीन, दो मुनि होकर वहाँ से विहार करता है । उत्कृष्ट रूप से चार मुनि मिलकर विहार करते हैं । मध्यम रूप से तीन मुनि और जघन्य रूप से दो मुनि मिलकर विहार करते हैं ।