+ एकल विहार में और भी अनेक दोष -
वंâटयखण्णुय पडिणिय साणगोणादि सप्पमेच्छेहिं
पावइ आदविवत्ती विसेण व विसूइया चेव ॥152॥
अन्वयार्थ : कांटे, ठूंठ विरोधीजन, कुत्ता, गौ आदि तथ सर्प और मलेच्छा-अज्ञानी जनों से, विष से और अजीर्ण आदि रोगों से अपने आप में विपत्ति को प्राप्त कर लेता है ।