
संगहणुग्गहकुसलो सुत्तत्थविसारओ पहियकित्ती
किरिआचरणसुजुत्तो गाहुय आदेज्जवयणो ये ॥158॥
गंभीरो दुद्धरिसो सूरो धम्मप्पहावणासीलो
खिदिससिसायरसरसो कमेण तं सो दु संपत्तो ॥159॥
अन्वयार्थ : आचार्य संग्रह और अनुग्रह में कुशल, सूत्र के अर्थ में विशारद, र्कीित से प्रसिद्धि को प्राप्त, क्रिया और चारित्र में तत्पर और ग्रहण करने योग्य तथा उपादेय वचन बोलने वाले होते हैं । जो गंभीर हैं, दुर्धर्ष हैं, शूर हैं और धर्म की प्रभावना करने वाले हैं, पृथ्वी, चन्द्र और समुद्र के गुणों के सदृश हैं ।