+ आगन्तुक मुनि का आचार्य श्री से निवेदन -
विस्समिदो तद्दिवसं मीमांसित्ता णिवेदयदि गणिणे
विणएणागमकज्जं बिदिए तदिए व दिवसमि ॥165॥
अन्वयार्थ : आगन्तुक मुनि उस दिन विश्रांति लेकर और परीक्षा करके विनयपूर्वक अपने आने के कार्य को दूसरे या तीसरे दिन आचार्य के पास अपने विद्या अध्ययन हेतु आगमन के कार्य को निवेदन करते हैं ।