+ आगन्तुक मुनि को पर-गण में वैयावृत्ति -
गच्छे वेज्जावच्चं गिलाणगुरु बालबुड्ढसेहाणं
जहजोगं कादव्वं सगसत्तीए पयत्तेणं ॥174॥
अन्वयार्थ : पर-गण में क्षीणशक्तिक, गुरु, बाल, वृद्ध और शैक्ष मुनियों की अपनी शक्ति के अनुसार प्रयत्न-पूर्वक यथा-योग्य वैयावृत्ति करनी चाहिए ।