
पलियंकणिसिज्जगदा वीरासणएयपाससाईया ।
ठाणुक्कडेहिं मुणिणो खवंति रिंत्त गिरिगुहासु ॥797॥
अन्वयार्थ : पर्यंक आसन से बैठे हुए, वीरासन से बैठे हुए या एक पसवाड़े से लेटे हुए अथवा खड़े हुए या उत्कुटिकासन से बैठे हुए वे मुनि पर्वत की गुफाओं में रात्रि को बिता देते हैं ।