+ विहार शुद्धि -
मुत्ता णिराववेक्खा सच्छंद विहारिणो जहा वादो ।
हडंति णिरुव्विग्गा णयरायरमंडियं वसुहं ॥799॥
अन्वयार्थ : मुनिराज मुक्त सर्वसंग से रहित, निरपेक्ष (किचिंत् भी इच्छा न रखते हुए) वायु के सम्मान स्वतन्त्र हुए नगर और खान से मण्डित इस पृथ्वीमण्डल पर विहार करते हैं ।