
वसुधम्मि वि विहरंता पिंड ण करेंति कस्सइ कयाई ।
जीवेसु दयावण्णा माया जह पुत्तभंडेसु ॥800॥
अन्वयार्थ : पृथ्वीतल पर विहार करते हुए भी ये मुनि किसी भी जीव विशेष को कभी भी पीड़ा नहीं पहुँचाते हैं, वे सदा जीव—दया में प्रवृत्त रहते हैं । जैसे जननी पुत्र—पुत्रियों पर दया करती है वैसे ही वे भी कभी भी किसी प्राणी को व्यथा नहीं उपजाते हैं सर्वत्र दयालु रहते हैं । प्रमाद रहित ईर्यापथ शुद्धि पूर्वक चलते हैं । अत: कर्मबन्ध नहीं होता है ।