
जीवाजीवविहत्तिं णाणुज्जोएण सुट्ठु पाऊण ।
तो परिहरंति धीरा सावज्जं जेत्तियं चि ॥801॥
सावज्जकरण जोग्गं सव्वं तिविहेण तियरणाविसुद्धं ।
वज्जंति वज्जभीरू जावजीवाय णिग्गंथा ॥802॥
अन्वयार्थ : वे साधु जीव और उसके नर नारकादि पर्यायों को खूब जानते हैं, तथा अजीव पदार्थों को पुद्गल, धर्म, अधर्म, आकाश और काल के भेद और पर्यायों को ज्ञान के प्रकाश से जानते हैं अत: जो कुछ दोष हैं उनका वे त्याग करते हैं । वे साधु दोष सहित जो इंद्रिय अर्थात् परिणाम हैं अथवा दोष सहित जो क्रिया हैं उनका मन—वचन—काय से कृत कारित और अनुमति से आजन्म त्याग करते हैं क्योंकि वे साधु पापों से डरते हैं ।