
तणरुक्खहरिदछेदणतयपत्तपवालकंदमूलाइं ।
फलपुफबीयघादं ण करेंति मुणी ण कारेंति ॥803॥
पुढवीय समारंभं जलपवणग्गीतसाणमारंभं ।
ण करेंति ण कारेंति य कारेंतं णाणुमोदंति ॥804॥
णिक्खित्तसत्थदंडा समणा सम सव्वपाणभूदेसु ।
अप्पट्ठं चिंतंता हवंति अव्वावडा साहू ॥805॥
अन्वयार्थ : तृण, वृक्ष हरि वनस्पति का छेदन तथा छाल, पत्ते, कोंपल कन्द-मूल तथा फल, पुष्प और बीज इनका घात मुनि न स्वयं करते हैं और न कराते हैं । वे मुनि पृथ्वी का समारम्भ, जल, वायु, अग्नि और त्रस जीवों का आरम्भ न स्वयं करते हैं न कराते हैं और न करते हुए को अनुमोदना ही देते हैं । वे श्रमण शस्त्र और दण्ड से रहित हैं, सर्व प्राणी और भूतों में समभावी हैं । आत्मा के हित का चिंतवन करते हुए वे साधु इन व्यापारों से रहित होते हैं ।