+ विहार करते हुए भावना -
भावेंति भावणरदा वइरग्गं वीदरागाणं च ।
णाणेण दंसणेण य चरित्तजोएण विरिएण ॥810॥
देहे णिरावयक्खा अप्पाणं दमरुई दमेमाणा ।
धिदिपग्गहपग्गहिदा छिंदंति भवस्स मूलाइं ॥811॥
अन्वयार्थ : भावना में लीन वे मुनि वीतराग तीर्थंकरों के ज्ञान, दर्शन, चारित्र तथा वीर्य की भावना करते हैं और साथ-साथ वैराग्य की भावना करते हैं । शरीर से निरपेक्ष, इन्द्रियजयी, आत्मा का दमन करते हुए धैर्य की रस्सी का अवलम्बन लेते हुए संसार के मूल का छेदन कर देते हैं ।