+ भिक्षाशुद्धि -
छट्ठट्ठमभत्तेहिं पारेंति य परधरम्मि भिक्खाए ।
जमणट्ठं भुंजंति य ण वि य पयामं रसट्ठाए ॥812॥
अन्वयार्थ : वेला, तेला, चौला, पाँच उपवास आदि करके परगृह में कृत, कारित, अनुमोदना से रहित तथा लाभ-अलाभ में समान बुद्धि रखते हुए भिक्षा विधि से पारणा करते हैं । चारित्र के साधन के लिए, क्षुधा का उपशमन करने के लिए, क्षुधा का उपशमन करने के लिए तथा मोक्ष की यात्रा के साधन मात्र हेतु आहार लेते हैं । जितने मात्र आहार से स्वाध्याय आदि में प्रवृत्ति होती है उतना मात्र ही लेते हैं किन्तु अजीर्ण होकर स्वाध्याय आदि में बाधा आ जाय ऐसा आहार नहीं लेते हैं ।