
णवकोडीपरिसुद्धं दसदोसविविंज्जियं मलविसुद्धं ।
भुंजंति पाणिपत्ते परेण दत्तं परघरम्मि ॥813॥
अन्वयार्थ : मन वचन काय से गुणित कृत कारित अनुमोदना रूप नव कोटि से शुद्ध, दस दोष से रहित, चौदह मल दोष से विशुद्ध, परगृह में पर के द्वारा दिये गए आहार को पाणिपात्र में ग्रहण करते हैं ।