
लद्धेण होंति तुट्ठा ण वि य अलद्धेण दुम्ममणा होंति ।
दुक्खे सुहे य मुणिणो मज्झत्थमणाउला होंति ॥818॥
अन्वयार्थ : आहार आदि मिल जाने पर संतुष्ट नहीं होते हैं और नहीं मिलने पर भी खेद खिन्न नहीं होते हैं, वे मुनि दु:ख और सुख में आकुलता रहित मध्यस्थ रहते हैं ।