+ हार में स्थिरता -
ण वि ते अभित्थुणंति य पिंडत्थं ण वि य किंचि जायंति ।
मोणव्वदेण मुणिणो चरंति भिक्खं अभासंता ॥819॥
देहि त्ति दीणकलुसं भासं णेच्छंति एरिसं वोत्तुं ।
अवि णीदि अला भेणं ण य मोणं भंजदे धीरा ॥820॥
अन्वयार्थ : भोजन के लिए किसी की स्तुति नहीं करते हैं और न कुछ भी याचना करते हैं । वे मुनि बिना बोले मौनव्रत पूर्वक भिक्षा ग्रहण करते हैं । 'दे दो' इस प्रकार से दीनता से कलुषित ऐसा वचन नहीं बोलना चाहते हैं, आहार के न मिलने पर वापस आ जाते हैं, किन्तु वे धीर मौन का भंग नहीं करते हैं ।