
पयणं व पायणं वा ण करेंति अणेव ते करावेंति ।
पयणारंभणियत्ता संतुट्ठा भिक्खमेत्तेण ॥821॥
अन्वयार्थ : मुनिराज भोजन पकाना या पकवाना भी नहीं करते हैं और न कराते हैं, वे पकाने के आरम्भ से निवृत्त हो चुके हैं, भिक्षा मात्र से ही सन्तुष्ट रहते हैं । काय को दिखाने मात्र से वे भिक्षा के लिए पर्यटन करते हैं ।