
असणं जदि वा पाणं खज्जं भोजं लिज्ज पेज्जं वा ।
पडिलेहिऊण सुद्धं भुंजंति पाणिपत्तेसु ॥822॥
जं होज्ज अविव्वण्णं पासुग पसत्थं तु एसणासुद्धं ।
भुंजंति पाणिपत्ते लद्धूण य गोयरग्गम्मि ॥823॥
अन्वयार्थ : अशन अथवा पान, खाद्य या भोज्य लेह्य या पेय इन पदार्थों को देखकर शोधकर करपात्र में शुद्ध आहार को ग्रहण करते हैं । जो एषणा समिति से शुद्ध है उसे आहार के समय प्राप्त कर पाणिपात्र में आहार करते हैं । एषणा समिति के छियालीस दोष और बत्तीस अन्तरायों से रहित हैं । ऐसा भोजन आहार की बेला में प्राप्त करके वे मुनि अपने पाणिपात्र में ग्रहण करते हैं ।