+ किस प्रकार के आहार का ग्रहण नहीं? -
जं होज्ज बेहिअं तेहिअं च वेवण्णजंतुसंसिट्ठं ।
अप्पासुगं तु णच्चा तं भिक्खं मुणी विवज्जंति ॥824॥
जं पुप्फिय किण्णइदं दट्ठूणं पूप-पप्पडादीणि ।
वज्जंति वज्जणिज्जं भिक्खू अप्पासुयं जं तु ॥825॥
अन्वयार्थ : जो आहार दो दिन का या तीन दिन का है, चलित स्वाद है, जन्तु से युक्त है, अप्रासुक है उसका जानकर मुनि उस आहार को छोड़ देते हैं और फपूंâदी सहित, बिगड़े हुए पुआ, पापड़ आदि देखकर तथा जो अप्रासुक है, छोड़ने योग्य है, मुनि उन सबको छोड़ देते हैं ।