+ व्याधि के उत्पन्न होने पर -
उप्पण्णम्मि य वाही सिरवेयण कुक्खिवेयणं चेव ।
अधियासिंति सुधिदिया कायतिगिंछं ण इच्छंति ॥841॥
ण य दुम्मणा ण विहला अणाउला होंति चेय सप्पुरिसा ।
णिप्पडियम्मसरीरा देंति उरं वाहिरोगाणं ॥842॥
अन्वयार्थ : रोग के होने पर, सिर की या उदर के वेदना के होने पर, वे धैर्यशाली मुनि सहन करते हैं किन्तु शरीर की चिकित्सा नहीं चाहते हैं । रत्नत्रय में दृढ़ रहते हैं । वे साधु दुर्मनस्क नहीं होते हैं तथा हित-अहित के विवेक से शून्य भी नहीं होते हैं । वे अनाकुल रहते हैं अर्थात् किंकर्तव्यविमूढ़ नहीं होते हैं, अब मैं इस रोग का क्या इलाज करुँ? कैसे करूँ ? कहाँ जाऊँ ? इत्यादि प्रकार से धबराते नहीं हैं । वे साधु विवेक शील रहते हुए शरीर के रोग के प्रतीकार से रहित होते हैं । प्रत्युत सभी प्रकार की व्याधियों के हो जाने पर भी धैर्यपूर्वक सहन करते हैं ।